यूपी का वो फर्जी एनकाउंटर जिसमें पुलिस ने पुलिस अधिकारी को ही मार डाला

बात 1982 की है उत्तरप्रदेश के गोण्डा जिले के कटरा बाजार थाना क्षेत्र के माधवपुर गाँव में एक इनकाउंटर हुआ. इस एनकाउंटर में तत्कालीन डीएसपी केपी सिंह उर्फ़ कृष्णप्रताप सिंह को अपनी जान गँवानी पड़ी. तत्कालीन डीएसपी केपी सिंह को सूचना मिली कि उस वक्त के कुख्यात अपराधी राम भुलावन और अर्जुन पासी माधवपुर गाँव में छुपे हुए हैं. सूचना मिलते ही केपी सिंह फ़ोर्स के साथ गाँव पहुंचे और उस वक़्त कटराबाजार थाने के सब इंस्पेक्टर आरबी सरोज की पुलिस की थ्योरी के हिसाब से अपराधियों ने केपी सिंह पर बम से हमला किया और जवाब में पुलिस की फायरिंग में 12 डकैतों को जान गँवानी पड़ी.

डीएसपी केपी सिंह उर्फ़ कृष्णप्रताप सिंह
डीएसपी केपी सिंह उर्फ़ कृष्णप्रताप सिंह

घटना के बाद केपी सिंह को अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. शहीद केपी सिंह की पत्नी विभा सिंह(जो उस वक़्त एक पीसीएस अधिकारी थीं) ने इस एनकाउंटर पर सवाल खड़े करके पूरी पुलिस फ़ोर्स को हैरान कर दिया. विभा सिंह ने आरोप लगाया कि यह एनकाउंटर फर्जी है और उनके पति की हत्या पुलिस वालों ने ही की है. उनके इन आरोपों से तत्कालीन एसपी यशपाल सिंह(जो 2005 से 2006 तक यूपी के डीजीपी थे) की कुर्सी हिल गयी.

 

विभा सिंह ने लिखित शिकायत की लेकिन पुलिस अधिकारियों ने उस शिकायत की जांच एवं कार्रवाई से साफ़ मना कर दिया. विभा सिंह को मज़बूरन कोर्ट का रास्ता चुनना पड़ा और हाईकोर्ट में वाद दायर की. फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामले में सीबीआई ने जांच शुरू की. 24 फ़रवरी 1984 को सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की. 28 फ़रवरी 1984 में 19 पुलिसवालों पर डीएसपी केपी सिंह की हत्या का आरोप दर्ज कर जांच शुरू की. 7 सितम्बर 2001 को सीबीआई ने जाँच पूरी कर चार्जशीट फ़ाइल की. सीबीआई ने जांच में इस एनकाउंटर को संदेहात्मक बताया.

1982 Gonda Case
1982 का गोंडा एनकाउंटर केस

सीबीआई की जांच में पता चला कि शहीद केपी सिंह कटराबाजार थाने के सबइंस्पेक्टर आरबी सरोज के खिलाफ भ्रष्टाचार, घूसखोरी एवं मानधिकार उल्लंघन के कई मामलों की जांच कर रहे थे. सीबीआई ने दर्ज किया कि पुलिस थ्योरी के अनुसार कई घंटों एनकाउंटर चला लेकिन मौकेवारदात से ऐसे कोई साक्ष्य बरामद नहीं हुए. गाँववालों, गवाहों, डॉक्टर के बयान पुलिस की थ्योरी से मेल नहीं खा रहे थे जिससे सीबीआई टीम का शक गहराता गया. सीबीआई की जांच में यह भी पता चला कि तथाकथित मारे गए डकैतों से बरामद हथियार कबाड़ थे और चलने की स्थिति में ही नहीं थे.

 

लम्बी जांच एवं कानूनी प्रक्रिया के बाद 29 मार्च 2013 को सीबीआई कोर्ट ने आठ पुलिसकर्मियों को इस फर्जी एनकाउंटर में दोषी पाया. कुल आरोपी 19 पुलिसकर्मियों में से 10 की जांच के दौरान ही मृत्यु हो गयी थी और सात सेवानिवृत्त हो चुके थे. कोर्ट ने आरोपी पुलिसकर्मियों आरबी सरोज, रामनायक पांडेय, राम करण यादव को मौत की सजा और नसीम अहमद, रमाकांत दीक्षित, मंगला सिंह, परवेज़ हुसैन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

 

कोर्ट के अनुसार 12 मार्च 1982 की रात को सब इंस्पेक्टर आरबी सरोज ने अपने सहकर्मियों के साथ डीएसपी केपी सिंह की हत्या का प्लान बनाया और उसे अंजाम तक पहुँचाया. जांच में पता चला कि आरबी सरोज ने ही केपी सिंह को माधवपुर गाँव में डकैतों के छुपे होने की सूचना दी थी. कोर्ट ने सीबीआई को धीमी जांच के लिए खूब खरी-खोटी सुनाई और यह भी कहा कि “ऐसा हो ही नहीं सकता कि 25 साल के आरबी सरोज को ऊपर से समर्थन न हो! लेकिन सीबीआई ने जांच के बाद चार्जशीट में उनका नाम दर्ज नहीं किया.”

 

कोर्ट ने माना कि आरबी सरोज का मकसद झूठी सूचना देकर डीएसपी की हत्या करने का था. आरबी सरोज और पुलिसकर्मियों ने अपनी थ्योरी सच करने के लिए 12 गाँव वालों की भी हत्या कर दी. कोर्ट ने सीबीआई की जमकर क्लास लगाई और कहा कि इतनी बड़ी घटना का ज़िम्मेदार सिर्फ आरबी सरोज को ठहराकर सीबीआई के अधिकारियों ने पुलिस के बड़े अधिकारियों को बचने की भरपूर कोशिश की है.

राम नायक पांडेय (सबसे बाएँ), आरबी सरोज (बीच में) और राम करण सिंह यादव कोर्ट से बाहर आते हुए। तस्वीर - नईम अंसारी, टेलीग्राफ़

राम नायक पांडेय (सबसे बाएँ), आरबी सरोज (बीच में) और राम करण सिंह यादव कोर्ट से बाहर आते हुए। तस्वीर – नईम अंसारी, टेलीग्राफ़

घटना के बाद गाँव वालों ने मीडिया को बताया था कि कैसे उनकी आँखों के सामने गाँव वालों की हत्या कर दी गयी और वो कुछ न बोल सके, न कर सके. यह केस भारतीय न्यायिक प्रक्रिया की सबसे धीमी गति से चलने वाली जांच को उजागर करता है. 31 साल बाद न्याय आया जबकि चार्जशीट 27 साल पहले ही दायर कर दी गयी थी. तत्कालीन सीबीआई जज ने इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर’ केस कहा था. डीएसपी केपी सिंह की एक बेटी किंजल सिंह आईएएस अधिकारी हैं जबकि दूसरी बेटी प्रांजल सिंह आईआरएस अधिकारी हैं.

(दीपक सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं. Uttarpradesh.ORG न्यूज़ में बतौर उत्तरप्रदेश, राजनीति, सुरक्षा एवं अपराध के मामलों की पत्रकारिता में योगदान दे चुके हैं.)

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